TURNING POINT IN CINEMA: #ME TOO AND THE RESHAPING OF INSTITUTIONS IN THE MALAYALAM FILM INDUSTRY

Original Article

TURNING POINT IN CINEMA: #ME TOO AND THE RESHAPING OF INSTITUTIONS IN THE MALAYALAM FILM INDUSTRY

सिनेमा का मोड़: #ME Too आंदोलन और मलयालम फिल्म उद्योग का संस्थागत परिवर्तन

 

Dr. Tehzeeb Fatma 1*

1 Assistant Professor, Vivekananda Institute of Professional Studies, Technical Campus, Delhi, India 

 

QR-Code

CrossMark

ABSTRACT

English: The #MeToo movement in Malayalam cinema has exposed persistent gendered harassment and structural inequalities within the film industry. Even before the global #MeToo campaign gained momentum in 2017, the Malayalam film industry was unsettled by a high-profile sexual harassment case that revealed exploitative practices that have been deeply embedded in its culture. This incident acted as a catalyst, prompting sustained debates on workplace ethics, gender sensitivity, and institutional accountability, finally paving the way for reform.

Adopting a descriptive case study approach, this research traces the movement’s trajectory by examining major incidents, institutional responses, and policy interventions. It highlights the role of the Women in Cinema Collective (WCC), which amplified survivor voices and mobilized pressure for systemic change. The study also analyzes the Hema Committee and its report which documented entrenched exploitation and emphasized the urgency of gender-sensitive reforms. By situating #MeToo within Malayalam cinema this study demonstrates its influence in reshaping industry practices, strengthening accountability, and advancing dialogue on gender justice.

 

Hindi: मलयालम सिनेमा में #ME TOO आंदोलन एक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभराए जिसने उद्योग के भीतर लंबे समय से चली आ रही लैंगिक उत्पीड़न और प्रणालीगत असमानताओं को चुनौती दी। जहाँ वैश्विक #ME TOO आंदोलन ने 2017 में गति पकड़ीए वहीं मलयालम फिल्म उद्योग पहले से ही अपने स्तर पर उथल-पुथल से गुजर रहा थाए जिसे एक हाई-प्रोफाइल उत्पीड़न मामले ने उजागर किया। यह घटना वर्षों से चली आ रही शोषणकारी प्रथाओं को सामने लाने में निर्णायक साबित हुई। इसके परिणामस्वरूप कार्यस्थल नैतिकताए लैंगिक संवेदनशीलता और संस्थागत जवाबदेही पर व्यापक चर्चा शुरू हुईए जिसने उद्योग के भीतर महत्वपूर्ण सुधारों को प्रेरित किया।

यह अध्ययन आंदोलन की यात्रा का विश्लेषण करने के लिए वर्णनात्मक केस स्टडी पद्धति का उपयोग करता हैए जिसमें प्रमुख घटनाओंए संस्थागत प्रतिक्रियाओं और नीतिगत हस्तक्षेपों का मूल्यांकन किया गया है। इसमें वीमेन इन सिनेमा कलेटिव (WCC) की भूमिका का गहन अध्ययन किया गया हैए जिसने पीड़ितों की आवाज़ को सशक्त बनाया और उद्योग में प्रणालीगत बदलाव के लिए दबाव बनाया। इसके अतिरिक्तए अध्ययन हेमा समिति और उसकी रिपोर्ट का भी विस्तार से विश्लेषण करता है। जो गहराई से जड़ जमाए शोषण को उजागर करती है और लैंगिक.संवेदनशील सुधारों की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। मलयालम सिनेमा में रुडमज्वव आंदोलन की समीक्षा के माध्यम से यह शोध उद्योग मानदंडों को आकार देनेए जवाबदेही को बढ़ावा देने और लैंगिक न्याय पर संवाद को आगे बढ़ाने में इसकी भूमिका का अन्वेषण करता है।

 

Keywords: Me Too, Malayalam Cinema, Sexual Harassment, Women's Movement, Institutional Change, मी टूए, मलयालम सिनेमा, यौन उत्पीड़न, महिला आंदोलन, संस्थागत परिवर्तन   


प्रस्तावना

2017 में #ME TOO आंदोलन एक परिवर्तनकारी शक्ति के रूप में उभराए जिसने यौन उत्पीड़नए लिंग आधारित भेदभाव और विभिन्न उद्योगों-विशेषकर मनोरंजन उद्योग-में व्याप्त गहरे और व्यापक सत्ता असंतुलन को चुनौती दी। अफ्रीकी.अमेरिकी महिला कार्यकर्ता ताराना बर्क ने 2006 में इस आंदोलन की शुरुआत कीए ताकि यौन उत्पीड़न और यौन हिंसा के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके और सोशल मीडिया की शक्ति का उपयोग किया जा सके Jaffe (2018)। यह आंदोलन अक्टूबर 2017 में तब वैश्विक स्तर पर फैल गया जब अमेरिकी अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया मंच ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर #Me Too पोस्ट किया Zarkov and Davis (2018)

हालांकि वैश्विक #Me Too आंदोलन ने हॉलीवुड और विश्व स्तर पर व्यापक बदलाव लाएए भारत के दक्षिणी फिल्म उद्योगकृविशेषकर प्रगतिशील दृष्टिकोण के लिए प्रसिद्ध मलयालम फिल्म उद्योग (मॉलीवुड) - ने पहले ही आत्ममंथन की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। यह उद्योग लंबे समय से उत्पीड़नए भेदभाव और संरचनात्मक असमानताओं जैसी समस्याओं से जूझ रहा था। 2017 में मलयालम अभिनेत्री भावना मेनन के अपहरण और यौन उत्पीड़न की घटना ने इस उद्योग को एक गंभीर संकट और मोड़ पर ला खड़ा किया। इस घटना की व्यापक निंदा हुई और कार्यस्थल की संरचना तथा लैंगिक न्याय की आवश्यकता पर गंभीर विमर्श शुरू हुआ। ऐतिहासिक रूप सेए मलयालम फिल्म उद्योग पितृसत्तात्मक ढांचे से प्रभावित रहा हैए जिसने महिलाओं की स्वतंत्रता को पर्दे पर और पर्दे के पीछे सीमित किया है। इस आंदोलन ने कार्यस्थल पर उत्पीड़नए लैंगिक पक्षपात और प्रणालीगत सुधारों की आवश्यकता पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया। यह शोधपत्र मलयालम सिनेमा में इस आंदोलन की दिशाए फिल्म निर्माण और उद्योग की कार्यप्रणालियों पर इसके प्रभाव तथा लैंगिक समानता के व्यापक निहितार्थों की पड़ताल करता है।

यह अध्ययन वर्णनात्मक केस स्टडी पद्धति को अपनाता है ताकि मलयालम सिनेमा में #Me Too आंदोलन के विकास और प्रभाव का विश्लेषण किया जा सके। इसमें आंदोलन की उत्पत्तिए प्रमुख घटनाओं की पहचान और उद्योग में आए परिवर्तनकारी बदलावों की जांच की गई है।

यह शोधपत्र मलयालम सिनेमा में #Me Too आंदोलन को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में रखकर देखता है। शोध में विषयवस्तु जाँचए मीडिया विश्लेषण और दस्तावेज़ विश्लेषण जैसी पद्धतियों का उपयोग किया गया है ताकि सामाजिक सक्रियताए सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व और उद्योग की कार्यप्रणालियों के अंतर्संबंधों की समझ विकसित की जा सके। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि रुडमज्वव जैसे आंदोलनों ने लिंग आधारित आख्यानों को पुनर्परिभाषित करनेए जवाब.देही की मांग करने और समावेशिता व समानता के लिए संवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हैकृविशेषकर फिल्म उद्योग जैसे रचनात्मक क्षेत्रों मेंए जहां उत्पीड़न की घटनाएं आम  समझी जाती रही हैं।

 

साहित्य समीक्षा

2017 में वैश्विक स्तर पर व्यापक समर्थन प्राप्त करने वाला #ME TOO आंदोलन लिंग अध्ययनए कानूनए मीडिया और संगठनात्मक व्यवहार जैसे क्षेत्रों में गहन अकादमिक शोध का विषय रहा है। इस आंदोलन की अवधारणा मूल रूप से 2006 में कार्यकर्ता ताराना बर्क द्वारा यौन हिंसा से पीड़ितों को समर्थन देने के लिए एक जमीनी पहल के रूप में की गई थी Jaffe (2018)। यह आंदोलन तब मुख्यधारा की चर्चा का हिस्सा बना जब अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के माध्यम से पीड़ितों को अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रेरित किया Zarkov and Davis (2018)। इस आंदोलन ने यह उजागर किया कि यौन उत्पीड़न की घटनाएं मुख्यतः सत्ता और वर्चस्व की अभिव्यक्ति होती हैं, न कि यौन आकर्षण का परिणाम। इसने संस्थानों में यौन उत्पीड़न और हमलों को लेकर एक गंभीर आत्ममंथन की प्रक्रिया शुरू कीए जिससे सांस्कृतिक और कानूनी स्तर पर महत्वपूर्ण बदलाव आए।

बढ़ते शोध साहित्य में डिजिटल सक्रियता की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया हैए जिसमें यह देखा गया है कि सोशल मीडिया ने किस प्रकार पीड़ितों की कहानियों को व्यापक मंच प्रदान किया और सामूहिक एकजुटता को बढ़ावा दिया Mendes et al. (2018) । गिल और ऑर्गड ने यह विश्लेषण किया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नारीवादी सक्रियता के नए रूपों को कैसे जन्म दिया Gill and Orgad (2018)

#ME TOO के दीर्घकालिक प्रभाव अब भी अकादमिक बहस का केंद्र बने हुए हैं। यद्यपि इस आंदोलन ने जागरूकता बढ़ाई है और नीति सुधारों को प्रभावित किया हैए फिर भी यह आवश्यक है कि इसके प्रभावों को स्थायी परिवर्तन में बदलने के लिए अंतर्विभाजित दृष्टिकोण अपनाए जाएं Phipps (2020), Rottenberg 2019)

भारत में और विशेष रूप से मलयालम सिनेमा में #ME TOO आंदोलन पर विद्यमान शोध सीमित है। हालांकिए यह स्पष्ट है कि मलयालम सिनेमा अब भी स्त्रीविरोधी प्रवृत्तियों से ग्रस्त है। महिला कलाकारों को अक्सर हाशिए पर रखा जाता हैए जब तक कि फिल्म महिला.केंद्रित न होए जो गहरे पितृसत्तात्मक ढांचे को दर्शाता है। सुपरस्टार्स और फैन एसोसिएशन का वर्चस्व बना हुआ हैए जैसा कि एक अभिनेत्री के साथ हुए हमले पर एएमएमए (AMMA) की प्रतिक्रिया में देखा गया। वुमेन इन सिनेमा कलेक्टिव (WCC) इस स्थिति को चुनौती देता है, और आलोचना के बावजूद समानता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है D (2021) । मीना टी. पिल्लई ने केरल के फिल्म उद्योग में व्याप्त स्त्रीविरोधी प्रवृत्तियों की गहराई से पड़ताल की हैए जो राज्य की सामाजिक संरचना में निहित पितृसत्तात्मक ढांचे को उजागर करती है Pillai (2017)। विद्वानों ने नीति सुधारोंए समान कार्य स्थितियों और लिंग.संवेदनशील भर्ती प्रक्रियाओं की आवश्यकता पर बल दिया है Nair (2017)

यह साहित्य समीक्षा #ME TOO आंदोलन के प्रमुख पहलुओं को स्पष्ट करने का प्रयास करती है और इस बात पर बल देती है कि भविष्य के शोधों को इस आंदोलन के विविध सामाजिक.राजनीतिक और कानूनी संदर्भों में विकास की प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए मलयालम सिनेमा में लैंगिक न्याय पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए।

 

विधि और कार्यप्रणाली

अनुसंधान उद्देश्य

·        मलयालम सिनेमा में रुडमज्वव आंदोलन की उत्पत्ति और प्रगति का विश्लेषण करना।

·        प्रोडक्शन प्रक्रियाओंए कास्टिंग निर्णयों और कथात्मक संरचनाओं सहित उद्योग प्रथाओं पर नारीवादी सक्रियता के प्रभाव की जाँच करना।

·        संस्थागत गतिशीलताओं का अध्ययन करनाकृयह समझना कि रुडमज्वव आंदोलन के चलते फिल्म उद्योग के भीतर संबंधों और संस्थागत ढाँचों का पुनर्संयोजन कैसे किया जा रहा हैए विशेष रूप से नियामक और नीतिगत ढाँचों में आए परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करते हुए।

 

कार्यप्रणाली

यह शोध गुणात्मक प्रकृति का है और चयनित मामले के विस्तृत अन्वेषण के लिए वर्णनात्मक केस स्टडी पद्धति को अपनाता है।

 

डेटा संग्रह

यह अध्ययन निम्नलिखित विविध स्रोतों से व्यवस्थित रूप से डेटा एकत्र करता है:

·        दस्तावेज़ और अभिलेख: जैसे वीमेन इन सिनेमा कलेटिव के आधिकारिक वक्तव्यए हेमा समिति की रिपोर्टए अन्य अभिलेखागार और संस्थागत रिपोर्टें।

·        समाचार रिपोर्टें: वे रिपोर्टें जो आंदोलन को प्रेरित करने वाली प्रारंभिक घटनाए वीमेन इन सिनेमा कलेटिव की गतिविधियोंए सामाजिक एवं सार्वजनिक विमर्शोंए तथा मीडिया में हेमा समिति की रिपोर्ट की कवरेज पर दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।

·        सार्वजनिक वक्तव्य और फ़िल्में: जैसे WCC से जुड़े व्यक्तियों के बयान तथा मलयालम फिल्म उद्योग के सदस्यों के वक्तव्यए जो सामूहिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों पर अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।

 

विश्लेषण और चर्चा

उत्प्रेरकर: वह घटना जिसने आत्ममंथन की शुरुआत की

मलयालम फिल्म उद्योग में रुडमज्वव आंदोलन को फरवरी 2017 की एक विचलित कर देने वाली घटना के बाद व्यापक गति मिलीए जब एक प्रसिद्ध अभिनेत्री का पाँच लोगों द्वारा अपहरण कर चलती गाड़ी में यौन उत्पीड़न किया गया Singh (2024), Janani (2024)। यह हमला न केवल किया गया बल्कि आरोपियों द्वारा रिकॉर्ड भी किया गयाए जिसने अपराध की अमानवीय प्रकृति को और गहरा कर दिया। बाद की जाँच में अभिनेता दिलीपकृजो उद्योग में अत्यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व माने जाते हैंकृकी कथित संलिप्तता सामने आई। उन पर व्यक्तिगत प्रतिशोध के रूप में इस हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। जाँच के अनुसार पीड़िता का अपहरण और उत्पीड़न उसे श्सबक सिखानेश् के उद्देश्य से किया गया था  Janani (2024)

इन आरोपों के बाद उद्योग के भीतर जड़ जमाए मुद्दों को लेकर कई अन्य महिलाओं ने भी अपनी आवाज़ उठाई। मलयालम सिनेमा में #ME TOO आंदोलन के दौरान अनेक गंभीर आरोप सामने आएए जिनमें कई प्रमुख हस्तियाँ शामिल थीं। उल्लेखनीय आरोपों में अभिनेता रणजीत पर बंगाली अभिनेत्री श्रीलेखा मित्रा द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप शामिल हैए जिसके बाद उन्होंने केरल चलचित्र अकादमी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया। सीपीएम विधायक एमण् मुकेश पर भी विस्तृत दुर्व्यवहार के आरोप लगेए जबकि पार्टी इस मुद्दे पर मौन बनी रही। अभिनेता बाबूराजए जो एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स (AMMA) के वरिष्ठ सदस्य हैं, पर एक जूनियर अभिनेत्री ने यौन शोषण का आरोप लगाया। अभिनेता जयसूर्या पर फ़िल्म दे इंगोट्टु नोक्किये (2008) के सेट पर अनुचित व्यवहारए सह.कलाकार को टटोलने और जबरन चूमने जैसे आरोप लगे HT News Desk (2024) । अभिनेता मणियनपिल्ला राजू पर मलयालम अभिनेत्री मिनु मुनीर ने मौखिक और शारीरिक दुर्व्यवहार का आरोप लगायाए जिन्होंने अपनी शिकायतों में अन्य सह.कलाकारों के नाम भी लिए (Timesofindia. Indiatimes, 2024)। अभिनेता सिद्धीक ने एक महिला कलाकार द्वारा बलात्कार के आरोप लगाए जाने के बाद ।डड। से इस्तीफ़ा दे दियाय पीड़िता का कहना था कि फ़िल्म परियोजना पर चर्चा के बहाने उनके साथ हमला किया गया FP Explainers (2024)|

इन खुलासों ने उद्योग.व्यापी सुधारों की माँग को और तेज कर दियाए जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न अधिकार समूहों ने मज़बूत कार्यस्थल सुरक्षा और जवाबदेही तंत्र की वकालत की। इन घटनाओं ने उद्योग में मौजूद गहरे शक्ति.संतुलनए आपस में जुड़े पेशेवर नेटवर्कए औपचारिक शिकायत निवारण प्रणालियों की कमी को उजागर किया।

 

पितृसत्तात्मक बनाम प्रगतिशील टकराव

असल में #ME TOO अब एक फैशन स्टेटमेंट बनता जा रहा है। इस तरह की किसी भी चीज़ की उम्र कम होती है और यह जल्द ही खत्म हो जाएगी। मोहनलाल (ट्विटर), अध्यक्ष, AMMA ET Online (2024)

#ME TOO आंदोलन और संस्थागत उत्पीड़न व यौन हिंसा के खिलाफ उठी महिला आवाज़ों को कभी-कभी केवल ध्यान आकर्षित करने या ष्फैशन के रूप में खारिज किया गया। वहीं दूसरी ओरए इस घटना ने एक ऐसे क्षण को भी जन्म दिया जब व्यापक मलयालम फिल्म उद्योग इस जघन्य अपराध की निंदा करने के लिए एकजुट हुआ।

घटना के तुरंत बाद मोहनलालए मंजू वारियरए पृथ्वीराजए निविन पॉली और दुलकर सलमान सहित कई कलाकारों ने सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रियाएँ साझा कींए जिससे सार्वजनिक विमर्श को बल मिला। वरिष्ठ अभिनेत्री केपीएसी ललिता ने बताया कि उद्योग में महिलाओं को अक्सर रात में यात्रा करनी पड़ती हैए जिससे असुरक्षा और भय की भावना बढ़ जाती है TNM Staff (2017)। अभिनेता ममूटी ने टिप्पणी कीए श्हम उसके गुस्से की मशाल हैं, जिसे ऐसी आग में बदलना चाहिए जो अपराधियों को नष्ट कर सके। मर्दानगी किसी महिला को दबाने में नहींए बल्कि उसकी रक्षा करने में है- TNM Staff (2017)

मलयालम सिनेमा की प्रमुख उद्योग संस्था एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स (AMMA) को आरोपों से निपटने के उसके तरीके और उसकी संस्थागत प्रतिक्रिया को लेकर कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा। 2017 के यौन उत्पीड़न मामले के बाद ।डड। की प्रतिक्रिया ठंडी और पीड़ितों के प्रति असहयोगी पाई गई। इसके साथ ही संरचनात्मक सुधार लागू करने में उसकी अनिच्छा की भी व्यापक आलोचना हुई। प्रारंभ में संस्था ने हमले की साजिश रचने के मुख्य आरोपी अभिनेता दिलीप को पुनः बहाल कर दियाए जबकि उद्योग पेशेवरों और अधिकार समूहों द्वारा व्यापक विरोध किया जा रहा था। इस निर्णय के परिणामस्वरूप कई महिला कलाकारों-जिसमें वीमेन इन सिनेमा कलेटिव  (WCC) की सदस्याएँ भी शामिल थीं-ने इस्तीफ़ा दे दिया और ।AMMA द्वारा नैतिक मानकों को बनाए रखने में विफलता की निंदा की Praveen (2018)

AMMA में दिलीप की पुनर्बहाली को लेकर उठा विवाद उद्योग में गहराई से जड़ जमाए पितृसत्तात्मक ढाँचों को उजागर करता है और इसने संस्थागत जवाबदेही तथा सुधार की माँग को और तेज़ कर दिया। इस घटना के बाद एक ओर पीड़िता के प्रति सहानुभूति की लहर दिखीए वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने विरोध प्रदर्शनों को मात्र ध्यान आकर्षित करने की कोशिश बताकर खारिज कियाकृजो उद्योग में व्याप्त गहरे पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। इसके समानांतरए महिला सदस्यों में तीव्र आक्रोश और परिवर्तन की माँग भी उभर कर सामने आई।

 

वीमेन इन सिनेमा कलेटिव (WCC)  

सामूहिक आक्रोश की अभिव्यक्ति और मलयालम फिल्म उद्योग में समानता तथा सुरक्षित कार्यप्रथाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वीमेन इन सिनेमा कलेटिव (WCC) की स्थापना 2017 में हुई और नवंबर 2017 में इसे औपचारिक रूप से पंजीकृत किया गया। यह फरवरी 2017 की घटना तथा यौन उत्पीड़न और उत्पीड़न से जुड़े अन्य अनुभवों के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप अस्तित्व में आया। इस घटना और उसके बाद की प्रतिक्रियाओं ने फिल्म उद्योग में गहराई से मौजूद पितृसत्तात्मकता को उजागर किया और न्याय की तलाश में पीड़ितों को झेलनी पड़ने वाली बाधाओं को रेखांकित किया।

विभिन्न पीढ़ियों और फिल्म निर्माण के विविध क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हुएए इस समूह ने मई 2017 में केरल के मुख्यमंत्री से मुलाकात कीए ताकि उद्योग में व्याप्त प्रणालीगत लैंगिक भेदभाव और असुरक्षित कार्यस्थल प्रथाओं को उजागर किया जा सके। साथ हीए सरकार से हस्तक्षेप और सुधार की माँग भी की गई Women in Cinema Collective (2017)। इसी प्रकार भारत का अपनी तरह का पहला संगठनकृ वीमेन इन सिनेमा कलेटिव(WCC) अस्तित्व में आया।

(WCC) की स्थापना चार प्रमुख उद्देश्यों के साथ की गई थी:

·        पहलाए फिल्म उद्योग में महिलाओं को झेलनी पड़ने वाली प्रणालीगत चुनौतियों और लैंगिक असमानताओं की ओर सरकारी ध्यान आकर्षित करना।

·        दूसराए लैंगिक समानता की रक्षा करने वाले और महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले कानूनी ढाँचों की समीक्षा और विश्लेषण करना।

·        तीसराए इन मुद्दों पर स्थापित उद्योग संस्थाओं के साथ संवाद और पैरवी करना।

·        अंततःए पीड़ितों के पक्ष में निरंतर मीडिया ध्यान और जन.पक्षधरता सुनिश्चित करना।

मलयालम फिल्म उद्योग में व्याप्त अशांति और भ्रष्टाचार को ध्यान में रखते हुए WCC ने सिनेमा आचार संहिता प्रस्तुत की। चार प्रमुख खंडों वाली यह आचार संहिता उद्योग में प्रगतिशील कार्य-संस्कृति स्थापित करने की प्रतिबद्धता थी। इसका उद्देश्य सभी के लिए कार्यस्थल अधिकार सुनिश्चित करना थाकृजिसमें अधिकतम कार्य घंटेए सभी कर्मियों के लिए अनिवार्य अनुबंधए महिलाओं की सुरक्षा और कार्यस्थल अधिकारों को शामिल किया गया। इसके अंतर्गत च्वैभ् अनुपालन लागू करनेए आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee) की स्थापना और औपचारिक शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने की बात कही गई। अंततः यौन उत्पीड़नए किसी भी प्रकार के भेदभावए धमकी या हिंसा के प्रति शून्य सहिष्णुता नीति लागू करने का प्रस्ताव रखा गया।

प्रसिद्ध फ़िल्मकार जियो बेबी ने टिप्पणी की कि मलयालम फिल्म उद्योग में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया चल रही हैए और केरल भर में कार्यस्थल गतिशीलताओं में बड़े बदलाव अपेक्षित हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह परिवर्तन मुख्यतः समाज की महिलाओंकृविशेष रूप से WCC के प्रयासोंकृद्वारा संचालित हो रहा है। उनके अनुसारए WCC का कार्य महिलाओं के लिए लैंगिक समानता और कार्यस्थल सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु उद्योग.व्यापी सुधारों की वकालत में निर्णायक रहा है।

मलयालम फिल्म उद्योग में एक महत्वपूर्ण नारीवादी हस्तक्षेप के रूप में WCC की स्थापना 2017 में केरल में हुई। यह यौन उत्पीड़न की घटना और उसके बाद दिखाई गई संस्थागत उदासीनता के प्रत्यक्ष प्रतिकार के रूप में गठित हुआ। तब से WCC संरचनात्मक सुधारए समान श्रम प्रथाओं और लैंगिक न्याय की पैरवी करने वाला एक केंद्रीय मंच बन चुका है। यह फिल्म उद्योग में च्वैभ् दिशानिर्देशों के कार्यान्वयन और आंतरिक शिकायत समितियों जैसी सुरक्षित कार्यस्थल संरचनाओं के निर्माण के माध्यम से नीतिगत हस्तक्षेप और संस्थागत सुधार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। AMMA जैसी पितृसत्तात्मक संस्थाओं को चुनौती देकर तथा केरल सिनेमा नीति जैसे सुझाव प्रस्तुत कर WCC ने समान कार्य वातावरण को बढ़ावा देने में योगदान दिया है।

 

हेमा समितिर फिल्म जगत की छिपी सच्चाइयों का अनावरण

वीमेन इन सिनेमा कलेटिव ने केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन से अपील की कि वे फिल्म उद्योग में महिलाओं की कार्य स्थितियों की जांच कराएं और सुरक्षा उपाय लागू करें। इसके परिणामस्वरूप केरल उच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त न्यायाधीश केण् हेमा की अध्यक्षता में हेमा समिति का गठन हुआ, जिसे मलयालम फिल्म उद्योग में महिलाओं को प्रभावित करने वाली संरचनात्मक और सांस्कृतिक चुनौतियों की जांच का कार्य सौंपा गया। इसमें कार्यस्थल की सुरक्षा, वेतन असमानता और लिंग आधारित भेदभाव जैसे मुद्दे शामिल थे। केरल सरकार द्वारा गठित 235 पृष्ठों की यह रिपोर्ट दक्षिण भारत की रचनात्मक अर्थव्यवस्थाओं में महिलाओं के श्रम और गरिमा को लेकर चल रहे सार्वजनिक विमर्श में एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है।   

रिपोर्ट की शुरुआत एक रूपक से होती है: आकाश रहस्यों से भरा हैए टिमटिमाते तारों और सुंदर चाँद के साथ,” लेकिन वैज्ञानिक जांच से पता चला कि श्तारे टिमटिमाते नहीं और चाँद सुंदर नहीं दिखता। Hema Committee (2024)80 से अधिक महिला पेशेवरों-जिनमें अभिनेता, डबिंग कलाकार, कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर और तकनीकी कर्मचारी शामिल हैं-की गहन गवाही के आधार पर यह रिपोर्ट मलयालम सिनेमा में व्याप्त लैंगिक पदानुक्रम और प्रणालीगत हिंसा की एक दुर्लभ और निर्भीक झलक प्रस्तुत करती है। इंटरसेक्शनल नारीवादी दृष्टिकोण से की गई विषयगत विश्लेषण में निम्नलिखित प्रमुख प्रवृत्तियाँ उभरती हैं: यौन हिंसा का सामान्यीकरण, श्रम संरचनाओं की अदृश्यता और असुरक्षा, संस्थागत मिलीभगत,न्यायिक हस्तक्षेप की अनुपस्थिति, और लैंगिक चुप्पी के प्रणालीगत तंत्र।

यौन हिंसा का सामान्यीकरणर: कई महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा किए, जिनमें भूमिकाओं के बदले यौन प्रस्ताव, पुरुष सहकर्मियों द्वारा जबरदस्ती, और शक्तिशाली पदों पर बैठे लोगों की अनुचित हरकतें शामिल थीं Scroll.in. (2020), Hema Committee (2024)। रिपोर्ट में कहा गया: श्सिनेमा में कोई भी-अभिनेताए निर्माताए निर्देशकए प्रोडक्शन कंट्रोलर या अन्यकृयौन संबंध की मांग कर सकता है और महिला को उनकी मांगों के आगे झुकना पड़ता है Hema Committee (2024)। इस प्रकार के व्यवहार की व्यापकता यह दर्शाती है कि उद्योग में बलात्कार संस्कृति और यौन शोषण गहराई से जड़ें जमाए हुए हैं, जहाँ उत्पीड़न को या तो अदृश्य बना दिया जाता है या सहमति के रूप में पुनर्परिभाषित कर दिया जाता Rajesh (2024)

महिला श्रम की अस्थिरता और हाशियाकरण: रिपोर्ट में यह उजागर किया गया कि विशेष रूप से पर्दे के पीछे काम करने वाली महिलाएं-जैसे कॉस्ट्यूम असिस्टेंट, डबिंग कलाकार और हेयरड्रेसर-अनौपचारिक और असुरक्षित रोजगार शर्तों के तहत काम करती हैं। इन्हें बिना किसी औपचारिक अनुबंध के काम पर रखा जाता है, जिससे इन्हें नौकरी की सुरक्षा या किसी भी प्रकार के लाभ नहीं मिलते। मलयालम फिल्म उद्योग में महिलाओं को बुनियादी मानवाधिकारों से भी वंचित किया जाता हैए जैसे शूटिंग स्थलों पर शौचालय और चेंजिंग रूम जैसी सुविधाएं Hema Committee (2024)

संस्थागत मिलीभगत और गैर.जवाबदेही: रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि एएमएमए (AMMA) जैसे उद्योग संगठन अपराधियों को संरक्षण देने और POSH अधिनियमए 2013 के तहत आंतरिक शिकायत समितियों (ICC) जैसी न्यायिक व्यवस्थाएं स्थापित करने में विफल रहे। ये संस्थाएं नियामक निकायों की भूमिका निभाने के बजाय पितृसत्तात्मक विशेषाधिकारों की संरक्षक बन गईं। विशेष रूप से एएमएमए की आलोचना इस बात के लिए हुई कि उसने एक हाई.प्रोफाइल यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी अभिनेता दिलीप को पुनः संगठन में शामिल कर लिया Ahmed (2017)। रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकाला गया कि एएमएमए और अन्य संस्थाओं की कार्रवाइयाँ केवल दिखावटी जवाबदेही के उदाहरण हैं-ऐसे वक्तव्य जो समावेशन का दावा तो करते हैं, लेकिन किसी भी वास्तविक संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाते।

 

प्रभाव और परिवर्तन

WCC द्वारा किए गए अग्रणी विरोध प्रदर्शनों और सुधार की माँगों ने 2024 में हेमा समिति रिपोर्ट के जारी होने के बाद AMMA के विघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एसोसिएशन ऑफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स (AMMA) की निष्क्रियता के कारण कई इस्तीफ़े हुए और आंतरिक टकराव सामने आए। AMMA ने ।डड। की पितृसत्तात्मक संरचना और भ्रष्ट उद्योग प्रथाओं को बढ़ावा देने में उसकी भूमिका की तीखी आलोचना की। हेमा समिति की रिपोर्ट ने इन प्रथाओं को राष्ट्रीय स्तर पर उजागर किया, जिसके परिणामस्वरूप अंततः AMMA का विघटन हुआ।

मलयालम सिनेमा में #MeToo आंदोलन के कारण केरल सरकार पर महिलाओं के लिए मज़बूत कार्यस्थल सुरक्षा उपाय लागू करने का दबाव बढ़ा। रिपोर्ट ने उद्योग में व्याप्त व्यापक यौन उत्पीड़न और अन्य शोषणकारी प्रथाओं को भी सामने रखाए जिसके परिणामस्वरूप PoSH अधिनियम का कार्यान्वयन और फ़िल्म सेटों पर शिकायत निवारण हेतु आंतरिक शिकायत समितियों (ICC) की स्थापना हुई।

इस आंदोलन के दूरगामी प्रभाव नई पीढ़ी की मलयालम फ़िल्मों की कथाओं में भी दिखाई देते हैं, विशेषकर उन फ़िल्मों में जो हमले की घटना के बाद और जाँच जारी रहने के दौरान रिलीज़ हुईं। फ़िल्मकार अब अपने कथानकों के माध्यम से लैंगिक मुद्दों को अधिक सक्रियता से संबोधित कर रहे हैं, जो सामाजिक रूप से सचेत कहानी कहने की ओर बदलाव को दर्शाता है। जियो बेबी निर्देशित द ग्रेट इंडियन किचन (2021), मार्टिन प्रक्काट की नयट्टू (2021), राहुल सदाशिवन की भूतकालम (2022) और अंजलि मेनन की वंडर वुमन (2022)जैसी फ़िल्मों ने मलयालम सिनेमा की कथात्मक दिशा को बदलने में योगदान दिया और लैंगिक.संवेदनशील कहानी कहने को केंद्र में लाया।   

 

निष्कर्ष

मलयालम सिनेमा में #MeToo आंदोलन एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ, जिसने उद्योग की संरचनाओं को पुनः आकार दिया और फ़िल्मकारों तथा संस्थागत निकायों से अधिक जवाबदेही की माँग को बल दिया। इस आंदोलन ने लैंगिक संवेदनशीलता, कार्यस्थल नैतिकता और गैर-शोषणकारी प्रथाओं से जुड़े विमर्श को मुख्यधारा में स्थापित किया तथा शोषण और भेदभाव की छिपी हुई संस्कृति को उजागर किया। एक लोकप्रिय अभिनेत्री से जुड़े हाई-प्रोफाइल उत्पीड़न मामले ने उत्प्रेरक की भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप शिकायतों की बाढ़ आ गई और उद्योग में व्याप्त गहरी शोषणकारी संस्कृति सामने आई।

यह आंदोलन सिनेमा में कार्यरत महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन-बिंदु बन गया, जिसने गहराई से जमी और सर्वव्यापी पितृसत्तात्मक संरचनाओं के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध को जन्म दिया तथा प्रणालीगत परिवर्तन की वकालत की। वीमेन इन सिनेमा कलेटिव  (WCC) ने पीड़ितों की आवाज़ को सशक्त बनाकर इस परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाईए कार्यस्थल सुरक्षा की माँग को आगे बढ़ाया और महिला कर्मियों की रक्षा करने में उद्योग संस्थाओं की विफलताओं को उजागर करते हुए उन्हें जवाबदेह ठहराया। इसका प्रभाव व्यक्तिगत गवाही तक सीमित नहीं रहा; इसने जनता और सरकार दोनों को सामाजिक तथा औद्योगिक सुधार की तत्काल आवश्यकता स्वीकार करने के लिए विवश किया।

हेमा समिति के गठन ने महिला अभिनेत्रियों, तकनीशियनों और उद्योग पेशेवरों द्वारा झेले जा रहे व्यापक लेकिन अब तक अनकहे शोषण को सामने लाया। एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में हेमा समिति रिपोर्ट नारीवादी सुधारों में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है, जो संस्थागत उदासीनता को चुनौती देती है और उद्योग तथा व्यापक भारतीय समाज में लैंगिक न्याय की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है। मलयालम सिनेमा में #MeToo आंदोलन ने यथास्थिति को झकझोर दियाए समाज को उसके भीतर छिपे विरोधाभासों से रूबरू कराया और परिवर्तन की दिशा में कदम उठाने को मजबूर किया।

यह रिपोर्ट फ़िल्म उद्योग में महिलाओं की दयनीय और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों को उजागर करने में निर्णायक रही, जिन्हें व्यापक सामाजिक.सांस्कृतिक परिदृश्य और अन्य कम ग्लैमरस उद्योगों में महिलाओं की स्थिति के प्रतिनिधि रूप में भी देखा जा सकता है। AMMA और अन्य संगठनों की प्रतिक्रियाएँ, पीड़ितों की कथाओं पर अविश्वास, तथा WCC को अपने सक्रियतावाद के दौरान जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा-ये सभी ऐसी संस्थागत प्रतिक्रियाओं से मिलती-जुलती हैं जो अन्य क्षेत्रों में भी देखने को मिलती हैं।

इस प्रकारए #MeToo आंदोलन और मलयालम फिल्म उद्योग समाज के एक सूक्ष्म प्रतिरूप (माइक्रोकॉसम) के रूप में उभरते हैं। हेमा समिति की खोजें और अनुशंसाएँ सभी उद्योगों पर लागू की जा सकती हैं, ताकि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके और राष्ट्र के सामाजिक व आर्थिक जीवन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके।

 

REFERENCES

Ahmed, S. (2017). Living a Feminist Life. Duke University Press. https://doi.org/10.1515/9780822373377   

Baxi, U. (2000). The Future of Human Rights. Oxford University Press. 

Braun, V., and Clarke, V. (2006). Using Thematic Analysis in Psychology. Qualitative Research in Psychology, 3(2), 77–101. https://doi.org/10.1191/1478088706qp063oa   

Chakravarty, D., and Ramachandran, S. (2018). Gendered Precarities in India’s Informal Economy. Economic and Political Weekly, 53(42). 

D, G. (2021). Misogyny in Malayalam Films. International Journal of Humanities and Social Sciences, 11(1), 7–15. https://doi.org/10.37622/IJHSS/11.1.2021.7-15   

ET Online. (2024, August 28). Metoo-is-a-Fad-Mohanlal-Faces-Backlash-As-Old-Comments-Resurface-After-AMMA-Resignation. Economic Times. 

FP Explainers. (2024, August 27). MeToo Haunts Mollywood: The Bigwigs Facing Sexual Abuse Allegations. Firstpost. 

Foucault, M. (1977). Discipline and Punish: The Birth of the Prison. Vintage. 

Galtung, J. (1990). Cultural Violence. Journal of Peace Research, 27(3), 291–305. https://doi.org/10.1177/0022343390027003005   

Gill, R., and Orgad, S. (2018). The Shifting Terrain of Sex and Power: From the “Sexualization of Culture” to #MeToo. Sexualities, 21(8), 1313–1324. https://doi.org/10.1177/1363460718794647   

HT News Desk. (2024, August 26). Malayalam Actor Baburaj Accused of Sexually Abusing Junior Artiste: Report. Hindustan Times. 

Hema Committee. (2024). Hema Committee Report on Gender Discrimination and Sexual Harassment in the Malayalam Film Industry [Government report]. Government of Kerala. 

Jaffe, S. (2018). The Collective Power of #MeToo. Dissent, 65(2), 80–87. https://doi.org/10.1353/dss.2018.0031   

Janani, K. (2024, August 26). Malayalam Film Industry’s #MeToo Scandal: Timeline, Charges, Hema Committee Report. India Today. 

Mendes, K., Ringrose, J., and Keller, J. (2018). #MeToo and The Promise and Pitfalls of Challenging Rape Culture Through Digital Feminist Activism. European Journal of Women’s Studies, 25(2), 236–246. https://doi.org/10.1177/1350506818765318   

Nair, T. S. (2017). Women in Cinema Collective and the Malayalam Film Industry. Economic and Political Weekly, 52(50), 14–17. 

Phipps, A. (2020). Me, Not you: The Trouble with Mainstream Feminism (1st ed.). Manchester University Press. https://doi.org/10.7765/9781526152725   

Pillai, M. T. (2017). The Many Misogynies of Malayalam Cinema. Economic and Political Weekly, 52(33), 52–58. 

Praveen, S. (2018, June 25). Women in Cinema Collective Condemns AMMA’s Decision to Reinstate Actor Dileep. The Hindu. 

Rajesh. (2024, October 10). 5 key Findings of the Hema Committee Report. Metis India. 

Scroll.in. (2020). Findings of the Hema Panel Reveal Deep Rot in Malayalam Film Industry. Scroll.in. 

Singh, N. (2024, September 4). MeToo in Malayalam Cinema Explained: Inside the Hema Committee Findings. Business Standard. 

TNM Staff. (2017, February 19). Malayalam Actor’s Night of Horror: Film Industry Protests in Kochi. The News Minute. 

The Hindu. (2020). Kerala Government Sits on Justice Hema Committee Report on Women in Cinema. The Hindu. 

The News Minute. (2020). What Happened to the Hema Committee Report? The News Minute. 

Women in Cinema Collective (WCC). (2020). Testimony to Hema Committee: Summary Excerpts. Internal Document (Accessed Via Press Briefings). 

Women in Cinema Collective. (2017). History. WCC Collective. 

Zarkov, D., and Davis, K. (2018). Ambiguities and Dilemmas Around #MeToo: #ForHowLong and #WhereTo? European Journal of Women’s Studies, 25(1), 3–9. https://doi.org/10.1177/1350506817749436   

Creative Commons Licence This work is licensed under a: Creative Commons Attribution 4.0 International License

© ShodhVichar 2026. All Rights Reserved.